कटक में सर्वप्रथम गुपचुप (पुचका) आया 1967 में। पढ़िये यह रिपोर्ट

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कटक में सर्वप्रथम गुपचुप (पुचका) आया 1967 में
शंकर एवं उसके पिता ने लोगों को
खिलाया मारवाड़ी पट्टी छक पर

नन्द किशोर जोशी

गुपचुप, पुचका ,पानीपुरी ये तीनों नाम अलग अलग जरूर हैं , लेकिन कार्य एक ही है .इनमें से किसी एक भी नाम आप लीजिये मुँह में पानी आना तय है. यह इनके नाम की खासियत है, महिमा है.बच्चे, बूढे, महिला, पुरुष सभी का प्रिय खाद्द है पुचका या गुपचुप, कुछ भी कह लीजिए.

बात 1967 की है पुचका महाशय गुपचुप तरीके से बिना शोर शराबे और प्रचार प्रसार के पधारे थे बिहार से ओडिशा के कटक शहर में. इनका आना आज के आने जैसा कतई नहीं था कि आयेंगे बाद में और शोर शराबा यानि प्रचार प्रसार कर कंपायमान करेंगे पहले.

जब गुपचुप पहली बार 1967 में कटक में गृहप्रवेश किया मारवाड़ी पट्टी छक पर , तब देखने लायक नजारा था .मारवाड़ी पट्टी में सेठ , साहूकार लोग हाथ में दोना पतर
लिए खडे रहते थे कई कई देर तक.

पहले का बाद दूसरा और दूसरे के बाद तीसरे का नंबर आता था. इस तरह करीब आधे पौन घंटे में आठ-दस लोगों के पास 4-5 गुपचुप पहुंच पाता था. नूतन और
स्वादिष्ट गुपचुप खाने के लिए इतने समय का इंतजार तो वाजिब ही था.

देखते ही देखते कटक शहर में अनेक बिहार से आकर गुपचुप बेचने लगे. शंकर ब्यापार बढाकर
क्रराइस्ट कोलेज पहुंच गया. जाँवलियापटी के मलिकबाग में बहुत गुपचुप वाले बसगये और कटक के कोने कोने में गुपचुप खुलेआम पहुंच गया. स्थानीय लोग भी इसे बनाने और बेचने में आनंद लेने लगे. खाने वाले तो रोज आनंद लेते ही हैं.

शुरुआत में कटक में एक रुपये में 20 गुपचुप बिका करते थे. इस गुपचुप महाशय का एक और लोकप्रिय नाम है गोलगप्पे. गुपचुप के साथ चुरमुर भी पुचका वालों ने खूब बेचा और आज भी बेच रहे हैं.

गुपचुप, पुचका के बारे में जानकारी देकर सहयोग दिये
मारवाड़ी पटी निवासी राज कुमार बथवाल (मीनू) ने.

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